‘हम चीनी नहीं, भारतीय हैं’ — एंजेल चकमा की मौत और नस्लीय न्याय की गूँज

हम चीनी नहीं, भारतीय हैं' — एंजेल चकमा की मौत और नस्लीय न्याय की गूँज

हम चीनी नहीं, भारतीय हैं’ — एंजेल चकमा की मौत और नस्लीय न्याय की गूँज

देहरादून/अगरतला: त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की देहरादून में हुई दुखद मृत्यु के बाद देशभर में गुस्से और शोक की लहर है। एक होनहार छात्र, जिसने अभी-अभी अपनी पहली नौकरी हासिल की थी, नफरत और हिंसा का शिकार हो गया। यह घटना न केवल एक परिवार की तबाही है, बल्कि भारत के सामाजिक ताने-बाने पर भी एक बड़ा सवाल है।

1. क्या हुआ था उस काली रात?

9 दिसंबर 2025 की रात, एंजेल चकमा अपने छोटे भाई माइकल के साथ देहरादून के सेलाकुई इलाके में खरीदारी करने निकले थे। आरोप है कि वहाँ कुछ नशे में धुत युवकों ने उनकी शारीरिक बनावट को लेकर उन पर नस्लीय टिप्पणियाँ कीं और उन्हें ‘चीनी’ और ‘मोमो’ कहकर चिढ़ाया। जब एंजेल ने विरोध करते हुए गर्व से कहा, “हम चीनी नहीं, भारतीय हैं”, तो विवाद बढ़ गया और हमलावरों ने उन पर चाकू और लोहे के कड़े से जानलेवा हमला कर दिया।

2. 17 दिनों तक मौत से जंग

एंजेल को गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी रीढ़ की हड्डी और गर्दन में गंभीर चोटें आईं। 17 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद, 26 दिसंबर को इस बहादुर छात्र ने अंतिम सांस ली। एंजेल के पिता, जो सीमा सुरक्षा बल (BSF) में तैनात हैं, अपने बेटे को इंसाफ दिलाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

3. पुलिस की कार्रवाई और विवाद

इस मामले में देहरादून पुलिस ने अब तक 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें दो नाबालिग शामिल हैं। मुख्य आरोपी, जो नेपाल का नागरिक बताया जा रहा है, फिलहाल फरार है और उस पर 25,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया है। हालांकि, पुलिस का कहना है कि यह आपसी झगड़े का मामला है, जबकि परिवार और छात्र संगठन इसे स्पष्ट रूप से ‘नस्लीय हिंसा’ (Racial Attack) करार दे रहे हैं।

4. देशभर में इंसाफ की मांग

एंजेल की मौत के बाद त्रिपुरा में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। मुख्यमंत्री माणिक साहा ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात कर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। वहीं, दिल्ली और पूर्वोत्तर के छात्र संगठनों ने केंद्र सरकार से ‘एंटी-रेसिज्म कानून’ (नस्लवाद विरोधी कानून) लाने की अपील की है ताकि भविष्य में किसी और छात्र को अपनी पहचान साबित करने के लिए जान न गंवानी पड़े।


घटना के मुख्य बिंदु:

  • पीड़ित: एंजेल चकमा (24), एमबीए फाइनल ईयर का छात्र (त्रिपुरा निवासी)।
  • आरोप: नस्लीय टिप्पणी और चाकूबाजी के कारण हुई हत्या।
  • सरकारी सहायता: उत्तराखंड सरकार ने पीड़ित परिवार को 4.12 लाख रुपये की शुरुआती सहायता राशि दी है।
  • मांग: मामले की सुनवाई उत्तराखंड से बाहर (दिल्ली या त्रिपुरा) करने और फास्ट-ट्रैक कोर्ट में केस चलाने की मांग।

क्यों ज़रूरी है बदलाव?

एंजेल चकमा की कहानी 2014 के निडो तनियम मामले की याद दिलाती है। यह सवाल खड़ा करती है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारत के एक हिस्से के नागरिकों को अपनी भारतीयता का प्रमाण क्यों देना पड़ता है?

“यह सिर्फ एक हत्या नहीं है, यह उस मानसिकता की जीत है जो विविधता को स्वीकार नहीं कर पाती। एंजेल ने अपनी पहचान के लिए जान दी, अब न्याय का अर्थ केवल दोषियों को सजा देना नहीं, बल्कि ऐसी सोच को खत्म करना है।”