ट्रम्प की ‘परमानेंट नेगोशिएशन’ नीति: वैश्विक व्यापार में मची खलबली; भारत और चीन के लिए क्या हैं इसके मायने?

Trump Trade Policy 2026

वॉशिंगटन/नई दिल्ली: वैश्विक व्यापार (Global Trade) के नियम एक बार फिर बदल रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी दूसरी पारी में व्यापार को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया है। अब दुनिया “फिक्स्ड टैरिफ” (निश्चित शुल्क) के दौर से निकलकर “परमानेंट नेगोशिएशन” (स्थायी बातचीत) के युग में प्रवेश कर चुकी है। इस नई नीति ने न केवल शेयर बाजारों को हिला दिया है, बल्कि भारत और चीन जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के लिए एक ‘अनिश्चितता का जाल’ बुन दिया है।

1. क्या है ‘परमानेंट नेगोशिएशन’ की रणनीति?

सरल शब्दों में कहें तो, ट्रम्प प्रशासन अब टैरिफ को एक ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल कर रहा है जिसे कभी भी कम या ज्यादा किया जा सकता है।

  • कोई स्थायी दर नहीं: पहले व्यापारिक समझौते वर्षों के लिए तय होते थे, लेकिन अब टैरिफ दरों को बातचीत की मेज पर सौदेबाजी के लिए खुला रखा गया है।
  • दबाव की राजनीति: ट्रम्प का मानना है कि टैरिफ के डर से देश अमेरिका के पक्ष में बेहतर ‘डील्स’ करेंगे। इसी रणनीति को विशेषज्ञ “परमानेंट नेगोशिएशन” कह रहे हैं, जहाँ कोई भी समझौता अंतिम नहीं है।

2. सुप्रीम कोर्ट का झटका और 15% ग्लोबल सरचार्ज

फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के पुराने टैरिफ ढांचे (IEEPA के तहत) को ‘अवैध’ घोषित कर दिया था। इसके जवाब में ट्रम्प ने Section 122 (Trade Act of 1974) का इस्तेमाल करते हुए 15% ग्लोबल इम्पोर्ट सरचार्ज लगा दिया।

  • 150 दिनों का अल्टीमेटम: यह टैरिफ फिलहाल 150 दिनों के लिए प्रभावी है। इस दौरान अमेरिका चाहता है कि अन्य देश अपनी व्यापारिक नीतियों को उसके अनुसार बदलें।
  • बाजार में अस्थिरता: इस “कभी हाँ, कभी ना” वाली स्थिति ने वैश्विक सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है।

3. भारत पर असर: राहत या आफत?

भारत के लिए यह स्थिति किसी ‘रोलरकोस्टर राइड’ से कम नहीं रही है।

  • टैरिफ का उतार-चढ़ाव: पिछले एक साल में भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ 26% से बढ़कर 50% तक गया और अब 15% के आसपास स्थिर होने की कोशिश कर रहा है।
  • IT और एक्सपोर्ट सेक्टर: भारत का आईटी सेक्टर और इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट्स इस अनिश्चितता से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। निवेशक इस बात को लेकर डरे हुए हैं कि अगली घोषणा कब और क्या होगी।
  • इमर्जिंग अपॉर्चुनिटी: हालांकि, ‘चीन प्लस वन’ (China Plus One) रणनीति के तहत कई कंपनियां चीन से निकलकर भारत आ रही हैं, जिससे लंबी अवधि में भारत को फायदा हो सकता है।

4. चीन के साथ बढ़ता तनाव

चीन के लिए ट्रम्प की नीति और भी सख्त है। ‘परमानेंट नेगोशिएशन’ के तहत अमेरिका चीन पर दबाव बना रहा है कि वह अपने मैन्युफैक्चरिंग डोमिनेंस को कम करे।

  • सप्लाई चेन का टूटना: सेमीकंडक्टर्स और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका लगातार टैरिफ को ‘नेगोशिएशन टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

5. भविष्य की राह: कैसे निपटें इस अनिश्चितता से?

विशेषज्ञों का मानना है कि अब कंपनियों को ‘टैरिफ-रिस्क’ को अपने बिजनेस मॉडल का हिस्सा बनाना होगा।

  1. बाजार का विविधीकरण (Diversification): केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय भारत को यूरोपीय संघ, आसियान (ASEAN) और अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार बढ़ाना चाहिए।
  2. घरेलू विनिर्माण: ‘मेक इन इंडिया’ को और मजबूती देनी होगी ताकि बाहरी झटकों का असर कम हो।
  3. तेजी से बातचीत: भारत को अमेरिका के साथ अपने ‘अंतरिम व्यापार समझौते’ (Interim Trade Deal) को जल्द से जल्द अंतिम रूप देना होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. ‘परमानेंट नेगोशिएशन’ से आम उपभोक्ता पर क्या असर होगा?

टैरिफ बढ़ने से आयातित सामान (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और कारें) महंगे हो सकते हैं। साथ ही, अनिश्चितता के कारण ग्लोबल ब्रांड्स अपनी कीमतें बार-बार बदल सकते हैं।

2. क्या भारत-अमेरिका व्यापार संबंध खतरे में हैं?

नहीं, लेकिन वे एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। दोनों देश एक बड़े व्यापार समझौते की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन टैरिफ की शर्तें बार-बार बदलना एक बड़ी चुनौती है।

3. क्या ट्रम्प का 15% टैरिफ हमेशा के लिए है?

नहीं, वर्तमान कानून के तहत यह 150 दिनों के लिए है। इसके बाद इसे आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी की आवश्यकता होगी।