बीजिंग/वॉशिंगटन | 01 फरवरी 2026: क्या दुनिया अब उस दौर की ओर बढ़ रही है जहाँ ‘डॉलर’ (USD) की जगह ‘युआन’ (CNY) का सिक्का चलेगा? चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आज एक आधिकारिक संबोधन में घोषणा की है कि चीन अब युआन को दुनिया की प्रमुख “अंतरराष्ट्रीय रिजर्व करेंसी” (International Reserve Currency) के रूप में स्थापित करने के लिए पूरी ताकत झोंक देगा।
शी जिनपिंग का यह बयान ऐसे समय में आया है जब रूस, ब्राजील और खाड़ी देश पहले से ही व्यापार के लिए गैर-डॉलर विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। इस कदम ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से चले आ रहे अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व (US Financial Hegemony) के अंत की चर्चा तेज कर दी है।
डी-डॉलरराइजेशन (De-dollarization) क्या है और चीन क्यों उतावला है?
पिछले 80 सालों से डॉलर दुनिया की सबसे शक्तिशाली करेंसी रही है। दुनिया का 80% से अधिक व्यापार और 60% विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में ही होता है। लेकिन अब स्थिति बदल रही है:
- प्रतिबंधों का डर: रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका ने जिस तरह रूस के डॉलर भंडार को फ्रीज किया, उससे चीन और अन्य देशों को यह डर सताने लगा है कि भविष्य में अमेरिका उनके साथ भी ऐसा कर सकता है।
- CIPS का विस्तार: चीन ने अपना खुद का पेमेंट सिस्टम CIPS (Cross-Border Interbank Payment System) विकसित किया है, जो स्विफ्ट (SWIFT) का विकल्प बन रहा है।
- पेट्रो-युआन की धमक: सऊदी अरब और ईरान जैसे तेल उत्पादक देश अब युआन में तेल बेचने पर विचार कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर ‘पेट्रो-डॉलर’ की नींव हिला रहा है।
शी जिनपिंग के इस ऐलान के 3 मुख्य आधार
शी जिनपिंग ने अपने भाषण में तीन बड़े बिंदुओं पर जोर दिया, जो युआन को रिजर्व करेंसी बनाने के मार्ग को प्रशस्त करेंगे:
- डिजिटल युआन (e-CNY): चीन दुनिया का पहला ऐसा बड़ा देश है जिसने अपनी डिजिटल करेंसी को व्यापक रूप से लागू किया है। यह बिना किसी अमेरिकी मध्यस्थता के अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को संभव बनाता है।
- BRICS+ का समर्थन: चीन को उम्मीद है कि ब्रिक्स देशों (भारत सहित) का विस्तार होने के बाद, ये देश आपसी व्यापार के लिए युआन या किसी नई साझा करेंसी का उपयोग करेंगे।
- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI): चीन जिन 150 से अधिक देशों में निवेश कर रहा है, वहां वह अब युआन में ऋण और भुगतान की शर्तें रख रहा है।
डॉलर बनाम युआन: वर्तमान स्थिति का विश्लेषण
| मानक | अमेरिकी डॉलर (USD) | चीनी युआन (CNY) |
| वैश्विक रिजर्व में हिस्सा | ~58.5% | ~2.7% |
| अंतरराष्ट्रीय भुगतान | ~47% | ~4.5% |
| विश्वास का स्तर | उच्च (पारदर्शी नीतियां) | मध्यम (सरकारी नियंत्रण) |
| भविष्य की संभावना (2026) | दबाव में (कर्ज संकट) | आक्रामक विस्तार |
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
भारत के लिए यह स्थिति ‘दोधारी तलवार’ जैसी है। एक तरफ भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है, तो दूसरी तरफ चीन के साथ उसका भारी व्यापार घाटा है।
- रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण: चीन के इस कदम के बीच भारत भी ‘भारतीय रुपया’ (INR) को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ावा दे रहा है। भारत ने पहले ही 20 से अधिक देशों के साथ रुपये में व्यापार के लिए विशेष वोस्ट्रो खाते खोले हैं।
- महंगाई का खतरा: यदि डॉलर कमजोर होता है और युआन मजबूत, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और सोने की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है, जिसका सीधा असर भारतीय मध्यम वर्ग की जेब पर पड़ेगा।
- निवेश का विकल्प: निवेशक अब अपना पैसा केवल डॉलर बॉन्ड्स में रखने के बजाय सोने या अन्य उभरती मुद्राओं में लगाने की सोचेंगे।
विशेषज्ञों की राय: क्या यह डॉलर का अंत है?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि डॉलर का गिरना इतना आसान नहीं है। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना और सबसे पारदर्शी बैंकिंग सिस्टम है। चीन के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि युआन की वैल्यू वहां की कम्युनिस्ट सरकार तय करती है, न कि बाजार। जब तक दुनिया को चीन के डेटा और नीतियों पर भरोसा नहीं होगा, युआन पूरी तरह डॉलर की जगह नहीं ले पाएगा।
निष्कर्ष: एक नए वित्तीय शीत युद्ध की शुरुआत
शी जिनपिंग का युआन को रिजर्व करेंसी बनाने का आह्वान केवल एक आर्थिक कदम नहीं, बल्कि एक भू-राजनीतिक हथियार है। यह ‘एकध्रुवीय दुनिया’ (Unipolar World) से ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ (Multipolar World) की ओर बढ़ने का संकेत है। आने वाले 5 साल यह तय करेंगे कि दुनिया के केंद्रीय बैंक अपनी तिजोरियों में डॉलर रखेंगे या युआन।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. रिजर्व करेंसी (Reserve Currency) क्या होती है?
यह वह विदेशी मुद्रा है जिसे दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने पास भारी मात्रा में रखते हैं ताकि वे अंतरराष्ट्रीय ऋण चुका सकें और अपने व्यापार को सुरक्षित रख सकें।
Q2. क्या युआन डॉलर की जगह ले सकता है?
निकट भविष्य में युआन डॉलर के एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर सकता है, लेकिन पूरी तरह जगह लेने के लिए चीन को अपनी अर्थव्यवस्था में अधिक पारदर्शिता लानी होगी।
Q3. भारत को इस स्थिति में क्या करना चाहिए?
भारत को अपनी ‘रुपी पेमेंट’ (Rupee Payment) प्रणाली को मजबूत करना चाहिए और किसी एक देश की मुद्रा पर निर्भर रहने के बजाय अपने रिजर्व का विविधीकरण (Diversification) करना चाहिए।







