21वीं सदी की भू-राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने शीत युद्ध के बाद बनी वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था की नींव हिला दी है। अमेरिका और डेनमार्क के बीच ‘ग्रीनलैंड’ को लेकर उपजा विवाद अब केवल एक ज़मीन के टुकड़े की खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के अस्तित्व के लिए काल बन गया है।
‘ग्रीनलैंड या नाटो’: डेनमार्क की दो टूक चेतावनी
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने वॉशिंगटन को स्पष्ट शब्दों में आगाह किया है कि संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने डैनिश नेशनल टीवी (TV2) पर एक ऐतिहासिक बयान देते हुए कहा:
“यदि अमेरिका किसी सहयोगी नाटो सदस्य की क्षेत्रीय अखंडता पर प्रहार करता है, तो उसी क्षण नाटो का अस्तित्व समाप्त मान लिया जाएगा। यह न केवल विश्वासघात होगा, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से स्थापित शांति के दौर का अंत होगा।”
ट्रम्प का ‘आर्कटिक विजन’ और 20 दिन का अल्टीमेटम
वेनेजुएला में हालिया सैन्य हस्तक्षेप के बाद उत्साहित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अब अपनी नज़रें आर्कटिक क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण द्वीप, ग्रीनलैंड पर टिका दी हैं।
- सुरक्षा का तर्क: ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि रूस और चीन ग्रीनलैंड के जरिए अमेरिका के ‘पिछवाड़े’ (Backyard) में सेंध लगा रहे हैं।
- संसाधनों की होड़: ग्रीनलैंड में मौजूद Rare Earth Minerals (दुर्लभ खनिज) और तेल के विशाल भंडार अमेरिकी तकनीकी वर्चस्व के लिए अनिवार्य बताए जा रहे हैं।
- कठोर रुख: ट्रम्प ने संकेत दिया है कि यदि कूटनीति विफल रही, तो अमेरिका “अन्य विकल्पों” पर विचार कर सकता है, जिसे डेनमार्क ने सैन्य हमले की धमकी के रूप में देखा है।
अनुच्छेद 5 (Article 5) की अग्निपरीक्षा
नाटो का बुनियादी सिद्धांत ‘सामूहिक रक्षा’ (Collective Defense) है, जिसके तहत एक सदस्य पर हमला, सब पर हमला माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका डेनमार्क पर दबाव बनाने के लिए सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करता है, तो नाटो के अन्य सदस्य (जैसे जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन) एक धर्मसंकट में फँस जाएंगे। क्या वे अपने सबसे बड़े सहयोगी (अमेरिका) के खिलाफ खड़े होंगे?
“हम बिकाऊ नहीं हैं”: ग्रीनलैंड का संकल्प
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने ट्रम्प की इस योजना को ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड एक लोकतंत्र है, कोई अचल संपत्ति नहीं जिसे कोई देश किसी दूसरे देश को बेच दे।
निष्कर्ष: दांव पर क्या लगा है?
यह विवाद केवल एक द्वीप का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का है जो दशकों से पश्चिमी देशों को एकजुट रखे हुए है। यूरोपीय संघ (EU) ने पूरी तरह से डेनमार्क का समर्थन किया है, जिससे अमेरिका और यूरोप के बीच एक बड़ी खाई खिंचती नज़र आ रही है।
घटनाक्रम का सारांश:
| मुख्य पक्ष | वर्तमान स्टैंड | संभावित परिणाम |
| अमेरिका (ट्रम्प) | ‘अमेरिका फर्स्ट’ के लिए ग्रीनलैंड का अधिग्रहण अनिवार्य। | नाटो से अलगाव या गठबंधन का नेतृत्व खोना। |
| डेनमार्क | किसी भी कीमत पर संप्रभुता की रक्षा। | यूरोपीय देशों के साथ नया रक्षा मोर्चा बनाना। |
| नाटो (NATO) | मौन और आंतरिक तनाव। | गठबंधन का पूरी तरह बिखर जाना। |







