भूमिका:
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, वर्तमान में एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। भारत सरकार द्वारा 21 नवंबर 2025 से लागू किए गए चार नए श्रम संहिताओं (Labour Codes) ने कॉर्पोरेट जगत के वित्तीय गणित को पूरी तरह से बदल दिया है। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, केवल पांच बड़ी आईटी कंपनियों को इस बदलाव के कारण ₹5,000 करोड़ से अधिक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा है।
1. ₹5,000 करोड़ का गणित: किस कंपनी को कितना ‘नुकसान’?
नए नियमों के तहत ‘मजदूरी’ (Wage) की परिभाषा बदलने से कंपनियों को अपने कर्मचारियों की पुरानी ग्रेच्युटी और छुट्टियों के बदले दी जाने वाली राशि (Leave Encashment) का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ा है।
| आईटी दिग्गज (IT Major) | एकमुश्त झटका (One-time Charge) |
| TCS (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) | ₹2,128 करोड़ |
| Infosys (इंफोसिस) | ₹1,289 करोड़ |
| HCLTech (एचसीएल टेक) | ₹956 करोड़ |
| Wipro (विप्रो) | ₹302 करोड़ |
| Tech Mahindra (टेक महिंद्रा) | ₹272 करोड़ |
2. आखिर क्यों बढ़ी कंपनियों की लागत? (Key Reasons)
नए लेबर कोड में सबसे बड़ा बदलाव ‘Wage Definition’ में किया गया है।
- 50% का नियम: अब किसी भी कर्मचारी की ‘बेसिक सैलरी’ और ‘महंगाई भत्ता’ (DA) उसकी कुल सैलरी (CTC) का कम से कम 50% होना अनिवार्य है। पहले कंपनियां बेसिक सैलरी कम रखती थीं और भत्ते (Allowances) ज्यादा, ताकि उन्हें PF और ग्रेच्युटी में कम योगदान देना पड़े।
- ग्रेच्युटी के नियम (Gratuity Rules): अब फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉइज (FTE) को भी 5 साल के बजाय केवल 1 साल की सेवा के बाद ग्रेच्युटी मिलेगी।
- लीव एनकैशमेंट: कर्मचारियों को अब 30 दिन से अधिक की छुट्टियों के बदले सालाना भुगतान की सुविधा दी गई है, जिससे कंपनियों की देनदारी (Liabilities) बढ़ गई है।
3. कर्मचारियों पर क्या होगा असर? (What it means for Employees)
भले ही कंपनियों को भारी खर्च उठाना पड़ रहा है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम कर्मचारियों के लिए मिले-जुले हो सकते हैं:
- इन-हैंड सैलरी में कमी: चूंकि बेसिक सैलरी बढ़ने से PF (Provident Fund) का योगदान बढ़ेगा, इसलिए आपकी टेक-होम या ‘इन-हैंड’ सैलरी 4-6% तक कम हो सकती है।
- मजबूत रिटायरमेंट फंड: PF और ग्रेच्युटी में अधिक योगदान का मतलब है कि जब आप नौकरी छोड़ेंगे या रिटायर होंगे, तो आपको मिलने वाला फंड पहले के मुकाबले काफी ज्यादा होगा।
- समान सुविधाएं: कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले और फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉइज को अब परमानेंट स्टाफ जैसी ही सामाजिक सुरक्षा मिलेगी।
4. क्या यह आईटी सेक्टर के लिए मंदी का संकेत है?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह एक ‘वन-टाइम’ (एक बार का) वित्तीय बोझ है। हालांकि इससे कंपनियों के दिसंबर तिमाही (Q3 FY26) के मुनाफे में 10-20% की गिरावट देखी गई है, लेकिन लंबी अवधि में यह नियमों को सरल बनाएगा।
- अनुपालन में आसानी: 29 पुराने लेबर कानूनों को अब केवल 4 कोड में समेट दिया गया है, जिससे कंपनियों के लिए ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ बढ़ेगा।
- मार्जिन पर दबाव: जेफरीज (Jefferies) जैसे वैश्विक ब्रोकरेज हाउस का मानना है कि आने वाले समय में आईटी कंपनियों के मार्जिन पर 10-20 बेसिस पॉइंट्स का दबाव बना रह सकता है।
5. भविष्य की राह: ऑटोमेशन और नई रणनीतियां
बढ़ती श्रम लागत (Labour Cost) से निपटने के लिए भारतीय आईटी कंपनियां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन पर ज्यादा जोर दे रही हैं।
- हायरिंग में बदलाव: कंपनियां अब फ्रेशर्स की भर्ती के बजाय स्किल्ड टैलेंट को प्राथमिकता दे रही हैं।
- लागत नियंत्रण: मुनाफे को संतुलित करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की सैलरी हाइक और बोनस में कटौती जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
नया लेबर कोड 2026 भारतीय कार्यबल के आधुनिकिकरण की दिशा में एक साहसी कदम है। हालांकि ₹5,000 करोड़ का यह ‘शॉक’ आईटी कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती है, लेकिन कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा के नजरिए से यह एक क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मध्यम और छोटी आईटी कंपनियां इस वित्तीय दबाव को कैसे झेलती हैं।







