अबू धाबी/वॉशिंगटन | 26 जनवरी 2026: पूरी दुनिया की निगाहें इस समय संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पर टिकी हैं, जहां दशकों के सबसे भीषण युद्ध को समाप्त करने के लिए एक मेज पर अमेरिका, रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधि इकट्ठा हुए। रूस-यूक्रेन शांति वार्ता 2026 का पहला दौर सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है। हालांकि, किसी अंतिम दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता पिछले चार सालों की सबसे बड़ी कूटनीतिक प्रगति है।
यूएई बना शांति का केंद्र: त्रिपक्षीय वार्ता के मुख्य बिंदु
इस वार्ता का आयोजन अबू धाबी में एक गुप्त स्थान पर किया गया, जिसमें तीन प्रमुख पक्षों ने भाग लिया:
- रूस: राष्ट्रपति पुतिन के विशेष दूत।
- यूक्रेन: राष्ट्रपति ज़ेलेन्स्की के शीर्ष कूटनीतिक सलाहकार।
- अमेरिका: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नियुक्त विशेष शांति दूत।
वार्ता के पहले दौर से क्या निकलकर आया?
- सीजफायर पर चर्चा: दोनों पक्ष अग्रिम मोर्चे (Frontlines) पर अस्थायी युद्धविराम (Ceasefire) के लिए एक रूपरेखा तैयार करने पर सहमत हुए हैं।
- कैदियों की अदला-बदली: मानवीय आधार पर ‘All for All’ (सभी के बदले सभी) कैदियों की अदला-बदली पर सहमति बनी है।
- अगला दौर: अगले दौर की वार्ता फरवरी 2026 के पहले सप्ताह में होने की संभावना है।
डोनाल्ड ट्रंप की ‘शांति योजना’ और अमेरिका की भूमिका
इस शांति वार्ता की सफलता का श्रेय काफी हद तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ विदेश नीति को दिया जा रहा है। ट्रंप ने सत्ता संभालने के बाद से ही वादा किया था कि वे 24 घंटे के भीतर युद्ध रोक सकते हैं।
ट्रंप की योजना के संभावित सूत्र:
- नाटो (NATO) विस्तार पर रोक: खबरों के अनुसार, अमेरिका यूक्रेन को 20 साल तक नाटो में शामिल न करने की शर्त पर रूस को मनाने की कोशिश कर रहा है।
- डिमिलिट्राइज्ड ज़ोन (DMZ): 800 मील लंबी फ्रंटलाइन पर एक बफर जोन बनाने का प्रस्ताव है, जिसकी निगरानी अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (जिसमें अमेरिकी सैनिक शामिल नहीं होंगे) कर सकती है।
यूक्रेन और रूस का रुख: क्या दोनों पक्ष झुकने को तैयार हैं?
युद्ध की थकान अब दोनों देशों पर साफ दिख रही है।
- यूक्रेन की मजबूरी: अमेरिकी सैन्य सहायता में संभावित कटौती और यूरोपीय देशों की ढुलमुल नीति के कारण ज़ेलेन्स्की अब “क्षेत्र के बदले शांति” (Land for Peace) के कड़वे घूँट पर विचार कर सकते हैं।
- रूस की आर्थिक स्थिति: तेल की गिरती कीमतें और पश्चिमी प्रतिबंधों के लंबे असर ने रूस को भी समझौते की मेज पर आने के लिए प्रेरित किया है।
“हम युद्ध नहीं, समाधान चाहते हैं। यह वार्ता उसी दिशा में पहला गंभीर कदम है।” – अबू धाबी कूटनीतिक कार्यालय
भारत पर इस शांति वार्ता का क्या असर होगा?
भारत ने हमेशा से ‘संवाद और कूटनीति’ (Dialogue and Diplomacy) का समर्थन किया है। रूस-यूक्रेन शांति वार्ता के सफल होने से भारत को कई लाभ होंगे:
- कच्चा तेल: तेल की कीमतों में स्थिरता आएगी, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी।
- उर्वरक और खाद: यूक्रेन से सप्लाई बहाल होने से भारतीय किसानों को सस्ती खाद मिल सकेगी।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला: अनाज और चिप्स (Semiconductors) की सप्लाई चैन सुधरेगी।
निष्कर्ष: क्या युद्ध वास्तव में समाप्त होगा?
हालांकि पहला दौर सकारात्मक रहा है, लेकिन रास्ते में अभी भी कई कांटे हैं। क्रीमिया (Crimeia) और डोनबास (Donbas) जैसे क्षेत्रों के भविष्य पर अभी भी गहरा मतभेद है। लेकिन यह सच है कि 2026 की यह शुरुआत पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं अधिक उम्मीदों भरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. क्या पुतिन और ज़ेलेन्स्की खुद इस वार्ता में शामिल थे?
नहीं, वर्तमान में यह वार्ता शीर्ष स्तर के दूतों और सलाहकारों के बीच हुई है। भविष्य में दोनों नेताओं की सीधी मुलाकात की संभावना तलाशी जा रही है।
Q2. शांति वार्ता के लिए UAE को ही क्यों चुना गया?
UAE के रूस, यूक्रेन और अमेरिका तीनों के साथ अच्छे संबंध हैं। साथ ही, यूएई ने पहले भी कैदियों की अदला-बदली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
Q3. ट्रंप का शांति प्रस्ताव क्या है?
ट्रंप का प्रस्ताव मुख्य रूप से युद्धविराम, नाटो विस्तार को टालने और विवादित क्षेत्रों पर यथास्थिति बनाए रखने पर केंद्रित बताया जा रहा है।







