नई दिल्ली/वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) अपनी कूटनीति में हमेशा से ही चौंकाने वाले फैसलों के लिए जाने जाते हैं। इस बार उन्होंने गाजा में शांति स्थापित करने और वहां के पुनर्निर्माण के लिए एक “बोर्ड ऑफ पीस” (Board of Peace) बनाने की घोषणा की है।3 लेकिन इस पहल ने शांति से ज्यादा विवादों को जन्म दे दिया है।
हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रम्प ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (PM Shehbaz Sharif) सहित दुनिया के कई दिग्गज नेताओं को इस बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया है। हालांकि, सबसे ज्यादा चर्चा इस बोर्ड की ‘स्थायी सदस्यता’ के लिए कथित तौर पर रखी गई $1 बिलियन (करीब 8300 करोड़ रुपये) की कीमत पर हो रही है।
क्या है ट्रम्प का ‘बोर्ड ऑफ पीस’? (What is Trump’s Board of Peace?)
डोनाल्ड ट्रम्प के 20-सूत्रीय व्यापक शांति प्लान (20-Point Peace Plan) के तहत ‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक अंतरराष्ट्रीय निकाय (International Body) होगा। इसका मुख्य उद्देश्य गाजा पट्टी में हमास के शासन के बाद एक नई प्रशासनिक व्यवस्था (Transitional Administration) बनाना और युद्ध से तबाह हुए क्षेत्र का पुनर्निर्माण करना है।
इस बोर्ड की अध्यक्षता स्वयं डोनाल्ड ट्रम्प करेंगे। इसमें उनके साथ पूर्व ब्रिटिश पीएम टोनी ब्लेयर, ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा जैसे बड़े नाम पहले से ही शामिल हैं।
$1 बिलियन का ‘प्रवेश शुल्क’: विवाद की असली वजह
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट और लीक हुए ड्राफ्ट चार्टर के अनुसार, इस बोर्ड में दो तरह की सदस्यता होगी:
- अस्थायी सदस्य (Temporary Members): जो बिना किसी फीस के शामिल होंगे, लेकिन उनका कार्यकाल केवल 3 वर्ष का होगा।
- स्थायी सदस्य (Permanent Members): जो देश $1 बिलियन या उससे अधिक का नकद योगदान देंगे, उन्हें बोर्ड में स्थायी सीट मिलेगी और उनके पास निर्णयों में अधिक शक्ति होगी।
आलोचकों का कहना है कि ट्रम्प अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को भी एक “बिजनेस डील” की तरह चला रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों का तर्क है कि यह पैसा पूरी तरह से गाजा के पुनर्निर्माण और वहां मानवीय सहायता पहुंचाने में इस्तेमाल किया जाएगा।
भारत और पाकिस्तान को न्योता: कूटनीतिक पेच (Modi and Sharif Invitation)
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोरे ने पुष्टि की है कि पीएम मोदी को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है:
- भारत का रुख: भारत हमेशा से इजरायल-फिलिस्तीन विवाद में ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ का पक्षधर रहा है। अगर भारत इस बोर्ड में शामिल होता है, तो मध्य पूर्व (Middle East) में उसकी भूमिका और बढ़ जाएगी।
- पाकिस्तान की एंट्री: पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने भी इस आमंत्रण की पुष्टि की है। पाकिस्तान के लिए यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को फिर से स्थापित करने का एक मौका हो सकता है, लेकिन $1 बिलियन की शर्त उसकी चरमराई अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा सवाल है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) बनाम बोर्ड ऑफ पीस
जानकारों का मानना है कि ट्रम्प इस बोर्ड के जरिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के समानांतर एक नई वैश्विक संस्था खड़ा करना चाहते हैं। ट्रम्प अक्सर यूएन की कार्यप्रणाली और फंडिंग की आलोचना करते रहे हैं। यदि यह बोर्ड सफल होता है, तो भविष्य में दुनिया के अन्य संघर्षों (जैसे यूक्रेन-रूस युद्ध) में भी इसी तरह की “निजी बोर्ड” कूटनीति देखी जा सकती है।
गाजा के लिए ‘न्यू गाजा’ (New Gaza) का सपना
ट्रम्प के प्लान में गाजा को “मिडिल ईस्ट रिवेरा” बनाने का विजन है। इसमें आलीशान इमारतें, आधुनिक बुनियादी ढांचा और विदेशी निवेश शामिल है।
- हमास का भविष्य: इस प्लान के तहत हमास को पूरी तरह से हथियार छोड़ने होंगे।
- फिलिस्तीनी शासन: गाजा का प्रशासन एक ‘टेक्नोक्रेटिक समिति’ संभालेगी, जिसकी निगरानी ‘बोर्ड ऑफ पीस’ करेगा।
निष्कर्ष: क्या यह शांति ला पाएगा?
ट्रम्प का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक साहसिक लेकिन विवादास्पद कदम है। जहाँ हंगरी और वियतनाम जैसे देशों ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है, वहीं भारत जैसे संतुलित नीति रखने वाले देश अभी ‘वेट एंड वॉच’ (Wait and Watch) की स्थिति में हैं। $1 बिलियन की “प्राइस टैग” ने इसे कूटनीति से ज्यादा एक आर्थिक निवेश बना दिया है।
क्या दुनिया के नेता ट्रम्प के इस नए ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ को स्वीकार करेंगे? या यह केवल एक और हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक प्रयोग बनकर रह जाएगा? आने वाले हफ्तों में दावोस (Davos) की बैठकों में इसकी स्थिति और स्पष्ट होगी।







