उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक 2025: अब धर्मांतरण पर होगी उम्रकैद! जानें नए कानून की हर बड़ी बात भूमिका:
उत्तराखंड की पावन देवभूमि अपनी संस्कृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक समरसता के लिए विश्व विख्यात है। समय के साथ बढ़ती चुनौतियों और कपटपूर्ण धर्मांतरण के मामलों को देखते हुए, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक अत्यंत कड़ा और दूरगामी फैसला लिया है। राज्य मंत्रिमंडल ने “उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक 2025” को मंजूरी दी है, जो न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के सबसे सख्त धर्मांतरण विरोधी कानूनों में से एक बनने की ओर अग्रसर है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की जनसांख्यिकीय संरचना की रक्षा करना और भोले-भले नागरिकों को लालच या डर के जाल से बचाना है।
1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: कानून का क्रमिक विकास (2018-2025)
उत्तराखंड में धर्मांतरण विरोधी कानून का सफर काफी चर्चाओं में रहा है। इसकी जड़ों को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह दर्शाता है कि कानून कैसे बदलती परिस्थितियों के साथ सख्त होता गया।
- उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2018: इस कानून की शुरुआत त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के दौरान हुई थी। उस समय इसका उद्देश्य बल, अनुचित प्रभाव और प्रलोभन के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को अपराध की श्रेणी में लाना था। तब इसमें सजा का प्रावधान कम था और यह आज जितना व्यापक नहीं था।
- 2022 का संशोधन: धामी सरकार के सत्ता में आने के बाद, धर्मांतरण के बढ़ते मामलों और ‘लव जिहाद’ जैसी शिकायतों को देखते हुए इसमें पहली बार बड़े संशोधन किए गए। सजा को बढ़ाकर 10 साल तक किया गया और कानून को गैर-जमानती बनाया गया।
- 2025 का ऐतिहासिक संशोधन: वर्तमान विधेयक न केवल सजा को उम्रकैद तक ले जाता है, बल्कि यह डिजिटल युग की उन नई चुनौतियों को भी संबोधित करता है जिनका अस्तित्व 2018 में नहीं था। यह विधेयक अब एक ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में उभरा है।
2. ‘प्रलोभन’ (Inducement) की नई और विस्तृत परिभाषा
कानूनी रूप से किसी को दोषी साबित करने के लिए ‘परिभाषा’ सबसे महत्वपूर्ण होती है। नए विधेयक में सरकार ने ‘प्रलोभन’ शब्द को इतना विस्तृत कर दिया है कि अपराधी किसी भी कानूनी छिद्र (Loophole) का फायदा न उठा सके।
- भौतिक लाभ और उपहार: अब न केवल सीधे नकद देना, बल्कि किसी को महंगे उपहार, इलेक्ट्रॉनिक्स, या संपत्ति का लालच देना भी प्रलोभन माना जाएगा।
- शैक्षिक और व्यावसायिक अवसर: किसी गरीब परिवार को उनके बच्चों की ‘मुफ्त शिक्षा’ का झांसा देकर या ‘नौकरी’ का वादा करके धर्म परिवर्तन कराना अब भारी पड़ेगा।
- धार्मिक महिमामंडन और हीनता: यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने के लिए दूसरे के आराध्य देवों या आस्था का अपमान करता है (जिसे मनोवैज्ञानिक दबाव भी कहा जाता है), तो उसे भी प्रलोभन और दबाव की श्रेणी में रखा जाएगा।
- वैवाहिक झांसा: शादी के नाम पर धर्मांतरण की शर्त रखना अब सीधे तौर पर अपराध माना जाएगा।
3. डिजिटल इंडिया में ‘डिजिटल प्रोपेगैंडा’ पर प्रहार
इस विधेयक की सबसे आधुनिक विशेषता इसका ‘डिजिटल क्लॉज’ है। आज के समय में धर्मांतरण के लिए गुप्त रूप से व्हाट्सएप ग्रुपों, यूट्यूब वीडियो और सोशल मीडिया विज्ञापनों का सहारा लिया जा रहा है।
- सोशल मीडिया पर प्रतिबंध: फेसबुक, इंस्टाग्राम या ट्विटर जैसे माध्यमों पर धार्मिक घृणा फैलाना या धर्मांतरण के लिए उकसाना अब विशेष दंड का विषय है।
- मैसेजिंग ऐप्स की निगरानी: व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए गुप्त रूप से प्रोपेगैंडा चलाने वालों के खिलाफ अब कड़ी कार्रवाई होगी। इसके लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को विशेष अधिकार दिए गए हैं।
- ऑनलाइन सामग्री: ऐसी किसी भी ऑनलाइन सामग्री का निर्माण या प्रसार प्रतिबंधित है जो सामाजिक समरसता बिगाड़कर धर्मांतरण को बढ़ावा देती हो।

धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक:
4. सजा का कड़ा खाका: अपराध के अनुसार दंड
विधेयक में सजा को अपराध की गंभीरता के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है, ताकि छोटे और बड़े अपराधियों में फर्क किया जा सके।
| श्रेणी | सजा की अवधि | आर्थिक जुर्माना |
|---|---|---|
| सामान्य अपराध | 3 से 10 वर्ष की जेल | न्यूनतम ₹50,000 |
| महिला, नाबालिग, SC/ST | 5 से 14 वर्ष की कठोर जेल | न्यूनतम ₹1,00,000 |
| सामूहिक/जबरन धर्मांतरण | 20 वर्ष से आजीवन कारावास | ₹10 लाख तक |
- आजीवन कारावास: यदि धर्मांतरण सामूहिक रूप से या अत्यंत क्रूरतापूर्वक बल प्रयोग करके किया जाता है, तो दोषी को अपनी पूरी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे बितानी होगी।
- गैर-जमानती अपराध: यह अपराध अब पूरी तरह से गैर-जमानती (Non-Bailable) है, यानी पुलिस हिरासत के दौरान राहत मिलना मुश्किल होगा।
5. पहचान छुपाकर विवाह और लव जिहाद के खिलाफ प्रावधान
उत्तराखंड सरकार ने उन मामलों पर कड़ा रुख अपनाया है जहाँ व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान छुपाकर (जैसे नाम बदलना या कलावा पहनना) दूसरे धर्म की लड़की से शादी करता है।
- अनिवार्य घोषणा: यदि कोई अपनी पहचान छुपाकर शादी करता है, तो विवाह स्वतः ही शून्य (Void) माना जाएगा और दोषी को न्यूनतम 10 साल की सजा होगी।
- कपटपूर्ण विवाह: झूठा प्यार और पहचान का उपयोग करके किया गया विवाह अब कानून की नजर में ‘बलात्कार’ के बराबर की गंभीरता से देखा जाएगा।
6. पीड़ितों का पुनर्वास: न्याय के साथ सुरक्षा
सिर्फ अपराधी को जेल भेजना ही काफी नहीं है, पीड़ित को समाज में फिर से स्थापित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
- पुनर्वास योजना: सरकार पीड़ितों को मानसिक और सामाजिक परामर्श (Counseling) प्रदान करेगी।
- मुआवजे का नियम: अदालत अपराधी से पीड़ित को ₹5 लाख तक का मुआवजा दिलवाएगी। यह राशि अपराधी की संपत्ति बेचकर भी वसूली जा सकती है।
- चिकित्सा और कानूनी सहायता: पीड़ितों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए सरकारी खर्च प्रदान किया जाएगा।
7. प्रक्रियात्मक जटिलताएँ और सुरक्षा तंत्र
कानून का दुरुपयोग न हो, इसके लिए कुछ प्रक्रियात्मक नियम भी रखे गए हैं:
- जिला मजिस्ट्रेट को सूचना: स्वेच्छा से धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति को कम से कम 60 दिन पहले जिलाधिकारी (DM) को हलफनामा देना होगा।
- पुलिस जाँच: DM द्वारा धर्मांतरण की वास्तविक मंशा जानने के लिए पुलिस से गुप्त जाँच कराई जाएगी।
- पुजारी/मौलवी की जिम्मेदारी: जो व्यक्ति धर्मांतरण करा रहा है, उसे भी सूचित करना होगा, वरना उसकी गिरफ्तारी भी संभव है।
8. वर्तमान स्थिति: राज्यपाल की भूमिका और आगे की राह
दिसंबर 2025 तक की स्थिति यह है कि उत्तराखंड के राज्यपाल ने विधेयक को कुछ तकनीकी सुधारों के लिए वापस भेजा है।
- तकनीकी खामियां: राज्यपाल ने “Prison Terms” और “Fine Structures” के भाषागत सुधारों का सुझाव दिया है।
- सरकार का पक्ष: मुख्यमंत्री धामी ने स्पष्ट किया है कि सरकार इन सुझावों को मानकर जल्द ही विधेयक को अंतिम मंजूरी के लिए भेजेगी।
9. अन्य राज्यों के साथ तुलना
उत्तराखंड अब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से भी एक कदम आगे निकल गया है। जहाँ अन्य राज्यों में अधिकतम 10 साल की सजा है, वहीं उत्तराखंड ने ‘उम्रकैद’ का प्रावधान जोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। यह दर्शाता है कि हिमालयी राज्यों में सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर कितनी गंभीरता है।
निष्कर्ष
2025 का यह संशोधन विधेयक केवल एक कानून नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का रक्षक है। कपटपूर्ण धर्मांतरण समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देता है। सजा को आजीवन कारावास तक बढ़ाना और डिजिटल माध्यमों को निगरानी में लाना यह साबित करता है कि धामी सरकार “सबका साथ, सबका विकास” के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए “जीरो टॉलरेंस” की नीति पर अडिग है। देवभूमि की पवित्रता को बनाए रखने के लिए यह कानून भविष्य में अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल का काम करेगा।







